एक बार फिर कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा विवाद सुर्खियों में

Karnataka-Maharashtra border dispute once again in headlines

एक बार फिर कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा विवाद सुर्खियों में

मुंबई: बेलगावी विधानसभा सत्र के साथ ही यह मुद्दा फिर से गरमा गया है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के शिनोली में महाराष्ट्र एकीकरण समिति ने रास्ता रोक कर प्रदर्शन किया। शिव सेना (उद्धव ठाकरे गुट)और राकांपा का भी उसे मौन समर्थन मिला। महाराष्ट्र एकीकरण समिति के कार्यकर्ताओं ने कर्नाटक के खिलाफ नारे लगाने के साथ-साथ सीमा मुद्दे की उपेक्षा के लिए महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ भी भड़ास निकाली।

मुंबई: बेलगावी विधानसभा सत्र के साथ ही यह मुद्दा फिर से गरमा गया है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के शिनोली में महाराष्ट्र एकीकरण समिति ने रास्ता रोक कर प्रदर्शन किया। शिव सेना (उद्धव ठाकरे गुट)और राकांपा का भी उसे मौन समर्थन मिला। महाराष्ट्र एकीकरण समिति के कार्यकर्ताओं ने कर्नाटक के खिलाफ नारे लगाने के साथ-साथ सीमा मुद्दे की उपेक्षा के लिए महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ भी भड़ास निकाली। कर्नाटक के मराठी भाषी सीमावर्ती क्षेत्रों को महाराष्ट्र में मिलाने की मांग को लेकर ऐसे ही प्रर्दशन कन्नड़ रक्षक वेदिका संगठन भी कई बार कर चुकी है। अब महाराष्ट्र विधानमंडल के शीतकालीन सत्र के दौरान भी इस मुद्दे के जोर-शोर से उठने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।


उत्तरी कर्नाटक में बेलगावी एवं उत्तर कन्नड़ जिलों को लेकर सीमा संबंधी विवाद काफी पुराना है। वर्ष 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अनुसार, जब राज्य की सीमाओं को भाषाई आधार पर निर्धारित किया गया, तब बेलगावी पूर्ववर्ती मैसूर राज्य का हिस्सा बन गया। बेलगावी का मसला कर्नाटक व महाराष्ट्र की सभी पार्टियों के चुनावी एजेंडे में रहता है। छह दशक से विधानसभा और परिषद के संयुक्त सत्र में गवर्नर के अभिभाषण में सीमा विवाद का जिक्रहोता रहा है। 2006 में राज्य विधानमंडल के शीतकालीन सत्र शुरू होने के बाद से अक्सर हर बार सीमा विवाद का मुद्दा बाहर आ ही जाता है। कर्नाटक सरकार कई बार दलील दे चुकी है कि महाराष्ट्र के कुछ गांवों को कर्नाटक में जोड़ा जाएगा। वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र सरकार कर्नाटक के 865 गांवों के मराठी भाषी लोगों के साथ है और इन गांवों को महाराष्ट्र में शामिल कराने की बात कर रही है।

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भारत अनेकता में एकता का प्रतीक है। हालांकि इस एकता को और मजबूत करने के लिये केंद्र व राज्य सरकारों दोनों को सहकारी संघवाद के लोकाचार को आत्मसात करने की आवश्यकता है। जहां तक महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद की बात है तो इसे लेकर पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों से छह सदस्यों की एक कमेटी बनाने का सुझाव दिया था। उस पर अमल किया जाना चाहिए। ये कमेटी सीमा विवाद से जुड़े सभी मुद्दों का निपटारा कर सकती है। अंतर-राज्यीय विवादों को दोनों पक्षों के सहयोग से हल करने का प्रयास किया जाना चाहिए। जिसमें केंद्र की भूमिका एक सूत्रधार या तटस्थ-मध्यस्थ के रूप में ही होनी चाहिए।

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यदि मुद्दों को सौहार्दपूर्ण ढंग से हल किया जाता है, तो संसद राज्य की सीमाओं को बदलने के लिए कानून ला सकती है। ऐसे कानून से कई राज्यों के विवाद पहले भी सुलझे हैं। वैज्ञानिक विधि से भी इसके निराकरण के प्रयास हो सकते हैं। राज्यों के बीच सीमा विवादों को वास्तविक सीमा स्थानों के उपग्रह मानचित्रण का उपयोग करके सुलझाया जा सकता है। अंतर-राज्यीय परिषद को पुनर्जीवित करना भी अंतर-राज्यीय विवाद के समाधान का एक विकल्प हो सकता है।

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